CURATED BY – UMESH KUSHWAHA | CITYCHIEFNEWS

सतना, बच्चों को शिक्षित करने की परिकल्पना को साकार करने के लिए विंध्य प्रदेश में जिन सरकारी स्कूलों को संचालित कराया जा रहा है, उनमें शोपीस संस्थानों की संख्या चौंकाने वाली है। शासकीय स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य बनाने के लिए मध्यप्रदेश सरकार द्वारा किए जा रहे तमाम प्रयासों पर पानी फेरने का काम उन्हीं शिक्षकों द्वारा किया जाता है जिन्हें हर महीने हजारों रुपए वेतन का भुगतान होता है। बताया जाता है कि विंध्य क्षेत्र के सतना, रीवा, सीधी, सिंगरौली, उमरिया, शहडोल और अनुपपुर जिले में संचालित होने वाले बहुत सारे ऐसे सरकारी प्राथमिक, माध्यमिक और हायर सेकंडरी स्कूलें हैं, जहां पर तैनात कई शिक्षक केवल टाइम पास करते हुए अपनी नौकरी निभाने के आदी हो गए हैं। निर्धारित समय पर स्कूलों में न पहुंचने वाले यह शिक्षक हस्ताक्षर करने के बाद प्राचार्य कक्ष अथवा स्टाफ रूम में अक्सर टाइम पास करते हुए देखे जाते हैं। घंटे दो घंटे का समय व्यतीत करने के बाद ये शिक्षक मनमर्जी करते हुए स्कूलों से गायब हो जाते हैं। यह सिलसिला लंबे समय से जारी रहने के बाद भी सात जिलों के शिक्षा अधिकारी और शासन स्तर पर स्कूल शिक्षा विभाग हांथ पर हांथ धरे बैठा है। यदाकदा डीईओ दूरस्थ क्षेत्रों के स्कूलों का निरीक्षण करते हुए अपने दायित्वों की खानापूर्ति पूरी करने तक सीमित रहते हैं। अब भला ऐसे हालात में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले हजारों बच्चों का भविष्य कैसे उज्जवल हो सकता है? सवाल यह उठता है कि टाइम पास करने वाले शिक्षकों पर जिला शिक्षा अधिकारी और स्कूल शिक्षा विभाग मेहरबानी क्यों दिखाता है? शासन स्तर से कड़ी कार्रवाई होने के कारण मनमर्जी चलाने वाले शिक्षकों के हौंसले बुलंद रहते हैं। जिम्मेदारों की घोर लापरवाही की वजह से विंध्य क्षेत्र के बहुतायत सरकारी स्कूलों में अराजकता का बोलबाला कायम हो गया है। गंभीर बात यह है कि इस दिशा में जिलों के कलेक्टर्स भी केवल बैठकों में कागजी घोड़े दौड़ाने तक सीमित रहते हैं। 

नेतागिरी करने वाले शिक्षकों पर नियंत्रण नहीं...?

स्कूल शिक्षा विभाग भी नेतागिरी की पकड़ से दूर नहीं है। कई तरह के शिक्षक संगठन मध्य प्रदेश में सक्रिय हैं, जिनके पदाधिकारी बड़ी संख्या में स्कूलों में जाकर बच्चों को पढ़ाना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते हैं। नेतागिरी करने वाले शिक्षकों की पदस्थापना जिन सरकारी स्कूलों में रहती है, वहां की दशा तो और गंभीर रहती है। स्कूल प्राचार्यों पर हमेशा दबाव बनाकर रखने वाले नेतानुमा शिक्षकों पर किसी का नियंत्रण नहीं होता है। अपने संगठनों के दम पर शिक्षक जिला शिक्षा अधिकारी को भी आईना दिखाने से परहेज नहीं करते हैं। बताया जाता है कि स्कूलों में टाइम पास करने के लिए शिक्षक बड़ी संख्या में मनपसंद शिक्षक संगठन की शरण में रहना पसंद करते हैं। नेतागिरी करने वाले शिक्षकों पर नियंत्रण करने का प्रयास तक जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा नहीं किया जाता है। कुल मिलाकर सात जिलों के अंचल क्षेत्रों में संचालित सरकारी स्कूलें और वहां पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य पूरी तरह से भगवान भरोसे रहता है।