खूबसूरत पहाड़ियों से घिरा गांव "बैरागी"
जहां मुर्गे पहलवानी के ताल ठोक कर उतरते हैं मैदान में
CURATED BY – UMESH KUSHWAHA | CITYCHIEFNEWS
छत्तीसगढ़ का मनेन्द्रगढ़- चिरमिरी- भरतपुर जिला अपने चारों तरफ प्राकृतिक सुंदरता से घिरा हुआ है. इसकी ऊंची नीची पहाड़ियों के बीच से गुजरते हुए घुमावदार रास्ते पर अपने वाहन चलाते हुए कभी बाएं कभी दाएं कभी झुक कर आप अपना संतुलन बनाने की कई मुद्राओं और योगासन का अभ्यास करते चलते हैं. इसी रास्ते के आसपास फैले सघन साल बनों का सौंदर्य अलग-अलग मौसम में अलग-अलग रूपों में जब प्रस्तुत होता है और अपनी अलग छटा बिखेरता है तब उसकी सुंदरता का वर्णन करने में वाणी मूक हो जाती है. इसी एम सी बी जिले के ताराबहारा ग्राम पंचायत में खूबसूरत पहाड़ियों से घिरा बैरागी गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता और ऊंची नीची पहाड़ियों के ढलान के रास्ते के लिए जाना जाता है. यहां तक पहुंचने के रास्ते मे पहाड़ियों और जंगलों के इतने अलग अलग दृश्य दिखाई पड़ते हैं, जिसे देखकर ऐसा लगता है कि थोड़ी दूर रुक कर इन्हें अपनी आंखों में कैद कर लें. हमारे साथी परमेश्वर सिंह से हमें जानकारी मिली कि यहां के पहलवान मुर्गै भी ताल ठोक कर अपने पहलवानी के दांव आजमाने मैदान में उतरते हैं. बड़ी ही रोचक कहानी है इस बैरागी गांव की आईए पर्यटन के लिए चलें इसी बैरागी गांव की ओर.
एमसीबी जिले के मुख्यालय मनेन्द्रगढ़ बाजार से बाहर निकल कर मनेन्द्रगढ़ को घेरकर चलने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग 43 के कटनी - गुमला मार्ग से कठौतिया तक 9 किलोमीटर की यात्रा करके हम कठौतिया पहुंचते हैं और यही से उत्तर दिशा में मनेन्द्रगढ़- जनकपुर मार्ग छ.ग. स्टेट हाईवे (राज्य मार्ग) क्रमांक 8 से चलते हुए लगभग 15 किलोमीटर की यात्रा पूर्ण कर हमें बिहारपुर पहुंचना है. बिहारपुर पहुंच कर दाहिनी ओर उत्तर पूर्व दिशा में दो मार्ग दिखाई देते हैं. पहला मार्ग बिहारपुर - सोनहत मार्ग एवं यहां से आगे बढ़कर 500 मी. के बाद दूसरा मार्ग बिहारपुर -बैरागी मार्ग कहलाता है. सड़क के किनारे लगे मील के पत्थर पर पीले रंग का सर्पिल आकार का पीले रंग का निशान बताता है कि यह गांव की प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत निर्मित सड़क है. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत बनाए गए इस सड़क पर चलते हुए आप देश की प्रगति के स्वप्नदृष्टा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को जरूर याद करते हैं अन्यथा बैरागी जैसे गांव तक पहुंचने में देश को अभी पचास बरस और लग जाते. गांव के विकास की नब्ज जानने वाले अटल जी का गांवों तक बिजली और सड़क पहुंचाने का संदेश का मूलमंत्र आज गांव के विकास की चाबी बन गया है.
बिहारपुर पहुंचकर बैरागी मार्ग पर मुड़ने से पहले यदि आपको यदि रास्ते का भ्रम हो तब किसी गांव वाले की सहायता लेकर सही मार्ग पर मुड़े. यहां से कुछ दूर लगभग 1.5 अर्थात डेढ़ किलोमीटर आगे बढ़ते ही एक छोटी सी नदी आपका रास्ता काटती हुई सड़क पार करती है, इसी नदी का पुल पार करते ही बांई और एक टीन सेड एवं घास फूस से बना आश्रम दूर से ही दिखाई पड़ता है. जी हां यह शिव धारा का मार्ग है. बैरागी जाते हुए यदि आप चाहे तब कुछ देर परिवार सहित शिवधारा के जलप्रपात का आनंद ले सकते हैं. यहां घटोल नदी की जलधारा जब पहाड़ी से अचानक 50 लाख फुट नीचे गिरती है तब वहां पहुंचते पहुंचते बिखर जाती है ऐसा प्रतीत होता है कि सचमुच भगवान शिव की जटाओं से होकर गुजरती जलधाराएं फैल रही है. यही कारण है कि इसका नाम शिव धारा रख दिया गया. इसी घटोल नदी की ऊंचाई पर पत्थरों के बीच सम्हल कर खड़े रहने की कोशिश मे बरगद की जड़े यहां पानी के साथ - साथ डूबती उतराती है. कई स्थानों पर यह जड़े पानी को रोक कर शरारती बच्चों का खेल खेलती दिखाई पड़ती है. ध्यान से देखने पर एवं कैमरे की नजर में यहां बरगद की जड़ों की शिराएं सचमुच में शिव की जटाओं का प्रतिबिंब दिखाई पड़ती हैं.
इसी शिव धारा के उत्तर में देवगढ़ की पहाड़ियों की श्रृंखला कहीं नीचे कहीं ऊंची होती हुई दूर तक अपनी बाहें फैलाई दिखाई देती हैं. अलग-अलग स्थान में इन पहाड़ियों को उस गांव या स्थान के नाम के साथ जोड़ दिया गया है. इसी तरह पहाड़ी से नीचे उतरते हुए जब हम बैरागी गांव पहुंचते हैं तब इसे बैरागी पहाड़ के नाम से ग्राम वासी जानते हैं. सतपुड़ा पहाड़ियों का यह अंचल धीरे-धीरे ढलान में बने रास्ते से आगे बढ़ता है यहाँ सघन साल वनों का सौंदर्य आपका मन मोह लेता है. बारिश के मौसम में निकली नई पत्तियों पर गिरते पानी को हाथ फैलाकर पत्तियाँ रोक लेती हैं फिर खपरैल घर की ओरी के नीचे खड़ी बालिका की तरह अंजूरी में भरकर बूंद बूंद जमीन पर गिराकर खुश होती है. कहीं-कहीं पर मोटी मोटी लतायें इन्हीं पेड़ों को गले लगाते हुए पेड़ों की गोलाईयों को नापती ऊंचाइयों तक पहुंच जाती है और वही अपनीपतली लंबी पत्तियों के बीच बैगनी पंखुड़ियां को फैलाकर ऊंचाई पर पहुंचने वाले बच्चों की तरह खिल खिलाकर हंस पड़ती है. पतझड़ में कुछ पत्तों के झड़ने की प्रक्रिया के बाद पानी बरसाने और उसे उड़ने से बचाने मे भी इन पेड़ों की पत्तियों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है. इसकी मजबूत लकड़ियों के कारण संस्कृत में से अग्निबल्लभा और अश्वकर्ण कहा जाता है. जबकि आंचलिक बोली में साल वृक्ष को बिहार के ग्रामीण सखुआ कहते हैं और छ.ग. के सरगुजा में इसे
सरई कहा जाता है. इसी सरई के नीचे ग्रामीण आदिवासी बालायें जब मशरुम ग्रुप की ग्रामीण सब्जियों में उपयोग होने वाले बर्षा ऋतु का उपहार पूटू और खुखड़ी उखाड़ने सिर पर टुकनी लेकर निकलती हैं तब पूरा जंगल इनके सौंदर्य पर मंत्रमुग्ध होकर जमीन मे बिछ जाता है. जी हां इन्हीं पेड़ो की जड़ो के आसपास सिर उठाकर इन बालाओं का सौदर्य देखने जब पूटू सिर उठाकरमिट्टी से बाहर देखता है उसी समय लड़कियों के नर्म हाथों से ये उखाड़ लिए जाते हैं. बस्तर में इसे बोड़ा कहा जाता है. सालवनों के नीचे लाल भुरभुरी मिट्टी में पैदा होने वाली मशरुम की यह पूटू प्रजाति सब्जी केवल प्रकृति ही पैदा कर सकती है. यही पूटू और खुखड़ी अपनी-अपनी टोकनी में भरकर जब ग्रामीण बालाएं बाजार में पहुंचती है तब बाजार में कोहराम मच जाता है और सब्जी बाजार में इसकी खरीद के लिए लोगों का हूजूम पहुंच जाता है. शुरुआती बाजार में इसकी कीमत आजकल ₹1000 से लेकर ₹1500 तक इन आदिवासियों को मिल जाती है. इनकी ऊँची कीमत के कारण अब दलाल सक्रिय हो गए है जो औने पौने दाम मे इनसे खरीद कर बाजार में ज्यादा कीमत पर बेचते देखे जा सकते हैं. प्रकृति का यह उपहार बरसात के दिनों में ग्रामीण बालाओं के अतिरिक्त आय का एक जरिया है हालांकि यह एक या 2 महीने के अंदर ही समाप्त हो जाता है, अगले साल फिर से पैदा होने के लिए.
बसंत के आगमन के साथ-साथ यही सरई के जंगल जब गुच्छे में फूलते हैं तब यह.कहना बहुत मुश्किल होता है कि यह फूल है या किसी कलाकार ने जंगल के बालो की वेणी में सफेद फूलों को सजाकर जंगल का श्रृंगार किया है. गर्मी के मौसम में इसके फल अपनी पंखुड़ियां के साथ जब उड़ते उड़ते दूर तक निकल जाते हैं तब इसे देखने के लिए हमें अपने आंखों को एकटक बिना पलक झपकाए देखना पड़ता है. बसंत और होली मे टेसू के फूलों से लदा जंगल होली आते-आते ऐसा प्रतीत होता है मानो जंगल में फागुन के रंगों की होली खेली जा रही हो. इन्हीं साल वनों से भरी पहाड़ियों के बीच से गुजरती सर्प की चाल की तरह इधर-उधर मुड़ते हुए रास्ते कुछ देर इस प्राकृतिक सुंदरता को आंखों में भर लेने हेतु आमंत्रित करते हैं. इन्ही ढलान से नीचे उतरते हुए पहाड़ों से घिरा एक गांव बड़ी दूर से दिखाई पड़ता है, जी हां यही है बैरागी गांव. जैसे-जैसे हम ढलान से नीचे पहुंचते हैं एक छोटी सी नदी किसी बालिका की तरह हाथ फैलाकर हमारा रास्ता रोक लेती है. नाम पूछने पर कहती है मैं हूं बैरागी पहाड़ से निकलने वाली केवई नदी . कभी इस गांव की यही नदी इस गांव का बरसात मे रास्ता रोक लेती थी. उस समयगांव वालों को इस पार से उस पार जाना बहुत मुश्किल था विशेष कर किसी सदस्य के बीमार हो जाने पर अस्पताल तक पहुंचना संभव नहीं होता था, लेकिन एक छोटे से पुल निर्माण के बाद अब यह रास्ता आसान हो गया है. इसी नदी की ऊंचाई की तरफ जब हम उत्तर की ओर देखते हैं तब लगभग एक किलोमीटर दूर में एक छोटा जलप्रपात दिखाई पड़ता है. बैरागी पहाड़ से निकलने वाली केवई नदी जैसे ही एक दो किलोमीटर आगे बढ़ती है अचानक 30 -40 फीट नीचे जमीन पर कूद जाती है और एक जलप्रपात का निर्माण करती है. गांव वाले इसे घघिया जलप्रपात कहते हैं. यह गांव चारों और से छोटी-छोटी पहाड़ियों से घिरा हुआ है. जाने क्या-क्या है इन पहाड़ियों में . कहते है वन्य जीवजन्तु के साथ साथ जंगली जड़ीबूटी का श्रोत है यह जंगल.कहते है पहले खरगोश बहुतायत मे यहां पाए जाते थे बंदरों की टोली कहीं भी छोटे छोटे बच्चों के साथ पेड़ो पर लटकते दिखाई देते थे. अब समय ने इनको सीमित कर दिया है जंगल मे इनके खाने के लिए कुछ बचा ही नहीं. वैज्ञानिक भाषा में जैवविविधता का भंडार है यह पहाड़ियाँ, लेकिन मानव दखलंदाजी ने इसमे भी अब सेंध लगा दी है. गांव के उत्तर में फैली पहाड़ी बम्हनी पहाड़ी कहलाती है. कहते हैं बनवासी भगवान श्री राम इन्हीं जंगलों के बीच ऋषि मुनियों की तपस्थली एवं आश्रमों में जब उनका आशीर्वाद लेने आए थे, उस समय मंत्र शक्ति के शीर्षस्थ ऋषि निदाध के आश्रम जटाशंकर तक भी पहुंचे थे. भूमिगत भगवान शिव का जटाशंकर मंदिर तक जाने का यह पुराना पहाड़ी पगडंडी मार्ग है जो इसी बैरागी गांव से आगे बढ़कर हनुमानगढ़ी होते हुए आगे बढ़ता है. कुछ लोग इसे हनुमान द्वारी भी कहते हैं. आगे यह कालीघाट से होते हुए लगभग 10 किलोमीटर की पैदल यात्रा करने के बाद चपलीपानी गांव से गुजरते हुए जटाशंकर तक पहुंचाती है.
इस बैरागी गांव की भी अपनी अलग कहानी है ग्रामीणों से बातचीत में पता चला कि गांव में मुर्गों की लड़ाई इस गांव की पहचान है आपने नाग पंचमी में पहलवानों को कुश्ती में ताल ठोकते हुए देखा होगा लेकिन बैरागी गांव में होली के दूसरे दिन परेवा तिथी को रंग गुलाल के बाद गांव के लोग चौपाल में इकट्ठा होते हैं और एक बड़ा घेरा बना लेते हैं. इसी घेरे में विशेष प्रशिक्षित मुर्गों को ताल ठोक कर लड़ने के लिए उतारा जाता है. फ्रीस्टाइल कुश्ती की तरह लड़ने वाले मुर्गे एक दूसरे को ऊपर उड़- उड़ कर आक्रमण करते हैं और एक दूसरे को लहूलुहान कर देते हैं. वाहवाही से सराबोर लोग उनका हौसला बढ़ाते है. निर्णायक जीतने वाले मुर्गे की घोषणा बुजुर्गों की टीम द्वारा की जाती है. इसी तरह महिलाओं द्वारा मुर्गा पकड़ के प्रतियोगिता का उत्साह और जुनून देखते ही बनता है कछनी कांछ कर( साड़ी को जरा उपर खींचकर कमर में खोंस लेना) मैदान में उतरने वाली महिलाएं जब बार-बार उड़- उड़ कर भाग जाने वाले मुर्गे के पीछे इधर-उधर दौड़ती है तब उनके माथे पर आया पसीना उनकी ताकत और मेहनत को दर्शाता है. मुर्गे भी शायद उन्हें इसी तरह इधर-उधर दौड़ता हुआ देखकर खुश होते है. इसीलिए उड़कर भाग जाने वाला मुर्गा अपनी ताकत और बल प्रयोग कर उन्हें छकाने का प्रयास करताहै. बहुत बढ़िया कहते लोग प्रतियोगी महिलाओं का उत्साह वर्णन करते हैं. कई घंटे चलने वाली इस प्रतियोगिता को देखने बाहर से कई गांव के लोगों का आना इस खेल को मनोरंजक और रोचक बना रहा है वहीं धीरे-धीरे इस बैरागी गांव की अपनी पहचान बनता जा रहा है.
साल भर बारहों महीने अपने अलग-अलग रूपों में सजे धजे साल वनो का यह सौंदर्य और बैरागी गांव पहुंचकर केवई नदी का घघिया जलप्रपात देखने का आनंद लेने के लिए बैरागी का नैसर्गिक सौंदर्य आपको आमंत्रित कर रहा है. प्रकृति के साथ जीवन जीने का मंत्र लिए आदिवासी परंपराओं में रचा बसा यह गांव अभी भी शहरी सभ्यता से दूर है . अब बच्चे यहां भी पढ़ लिखकर नौकरी और रोजी-रोटी की तलाश में बाहर निकल रहे हैं, लेकिन यह सिलसिला अभी बहुत दूर तक नहीं गया है. आपको जानकर खुशी होगी की पूर्व जिला पंचायत सदस्य रमेश राम जी इसी गांव के निवासी है और उन्होंने गांव के लिए काफी कुछ करने का प्रयास किया है जो वर्तमान में दिखाई पड़ रहा है लेकिन विकास के मामले में इस गांव मे अभी मूलभूत सुविधाओं के लिए यह उक्ति पर्याप्त होगी कि अभी दिल्ली दूर है. लेकिन इतना तय है कि बैरागी गांव आज भी अपनी निश्चल हंसी के साथ आपका मन मोह लेगी . इतना जरूर ध्यान रखें कि गांव में आपके चाय- पानी की व्यवस्था के लिए कोई होटल नहीं है. हां मौसमी फलों केला, पपीता और भुट्टा, खीरा जैसे ग्रामीण क्षेत्र में पाए जाने वाले मौसमी देसी फल आपको उपलब्ध हो सकते हैं. जो गांव की बाड़ी से आप खरीद कर या किसी समृद्ध किसान से उपहार में प्राप्त कर सकते हैं. इसलिए अपने साथ अपना जलपान स्वयं लेकर ही इस गांव तक पहुंचे और प्रकृति के गोद में बसे साल वनों का सानिध्य और जंगलों के बीच बसे आदिवासी जनजीवन से परिचित होने के लिए केवई नदी के उद्गम का गांव बैरागी आपका रास्ता निहार रहा है....