सहारनपुर, पहले नंबर की सहारनपुर लोकसभा सीट जिस पर पहले चरण में 19 अप्रैल को मतदान होगा। वहां प्रमुख दलों के उम्मीदवारों की जीत-हार में उनके विधायकों की भूमिका भी रहेगी। दिलचस्प यह है कि तीन प्रमुख उम्मीदवारों में से दो का अपना कोई विधायक ही नहीं है। तीसरी बार चुनाव लड़ रहे भाजपा के राघव लखनपाल शर्मा के पक्ष में उनकी पार्टी के तीन विधायक सहारनपुर महानगर के राजीव गुंबर, रामपुर मनिहारान के देवेंद्र निम और देवबंद क्षेत्र के बृजेश सिंह चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर अपने प्रत्याशी की जीत में दिन-रात एक किए हुए हैं। दूसरे प्रमुख उम्मीदवार कांग्रेस के इमरान मसूद जिनका भी यह तीसरा लोकसभा चुनाव है उनकी पार्टी का सहारनपुर संसदीय क्षेत्र में कोई विधायक नहीं है। इमरान मसूद पांचों विधानसभा क्षेत्रों में खुद ही अपने चुनाव अभियान की अगुवाई कर रहे हैं। अलबत्ता उनको समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी के दो विधायक बेहट के उमर अली खान और सहारनपुर ग्रामीण के आशु मलिक का लाभ जरूर इमरान मसूद को मिल सकता है। लेकिन दोनों ही विधायकों के इमरान मसूद से 36 का आंकडा है। इस संबंध में सवाल करने पर इमरान मसूद चुप्पी साध लेते हैं। ध्यान रहे खुद समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव सहारनपुर सीट से बसपा सांसद फजर्लुरहमान कुरैशी को उम्मीदवार बनाना चाहते थे और कांग्रेस के कोटे में सीट चले जाने पर उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व से भी फजर्लुरहमान को उम्मीदवार बनाने की पेशकश की थी। लेकिन कांग्रेस पार्टी अपने जुझारू मुस्लिम नेता इमरान मसूद के नाम पर ही अड़ी रही। इमरान मसूद का पूरे जिले के मुस्लिमों पर अच्छा-खासा प्रभाव माना जाता है।बेहट 
विधानसभा सीट पर तो 2007 के विधानसभा चुनाव में इमरान मसूद ने मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव सरकार में शामिल काबिना मंत्री जगदीश राणा को चुनाव में परास्त कर दिया था। इमरान मसूद को शायद ही सपा के दोनों विधायकों से उतना सहयोग मिल सके जितना अपेक्षित है। इमरान मसूद को मुस्लिम बहुल देवबंद सीट पर देवबंद के पूर्व पालिकाध्यक्ष एवं पूर्व विधायक माविया अली से भी सहयोग मिलता नहीं दिख रहा है। देवबंद के पूर्व पालिकाध्यक्ष जियाउद्दीन अंसारी अस्वस्थ हैं। लेकिन उनकी हमदर्दी बसपा उम्मीदवार माजिद अली के साथ है। माजिद अली जिला पंचायत के सदस्य हैं। माजिद अली देवबंद क्षेत्र के काली नदी पार क्षेत्र के गांव फुलास के निवासी हैं। उनकी पत्नी बसपा से जिला पंचायत की अध्यक्ष रह चुकी हैं। बसपा का भी जिले में कोई विधायक नहीं है।
माजिद अली थोड़े दिनों पहले तक चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी में थे। मायावती 14 अप्रैल को देवबंद क्षेत्र में उनके चुनाव प्रचार में आई थीं लेकिन मुस्लिमों की उपस्थिति बहुत कम होने से मायावती बसपाईयों पर कुपित हुई थी। मुस्लिमों की सोच के जानकार और विद्वान मौलाना अब्दुल्ला जावेद कहते हैं कि इस चुनाव में मुस्लिमों की पहली पसंद कांग्रेस है और उसके बाद मुसलमान समाजवादी के साथ है। यूपी में सपा-कांग्रेस गठबंधन होने से मुस्लिमों का रूझान उसी ओर रहेगा। मुस्लिमों में इमरान मसूद बसपा पर भारी पड़ सकते हैं। बसपा के कद्दावर नेता और मायावती की सीट से तीन बार विधायक रहे दलित नेता जगपाल सिंह भाजपा में हैं। उन्होंने पिछला चुनाव सहारनपुर देहात सीट से भाजपा के टिकट पर लड़ा था। भाजपा को हिंदू गूर्जरों में अच्छा समर्थन मिल रहा है। गुर्जर बिरादरी के मुकेश चौधरी और कीरतपाल सिंह भाजपा से विधायक हैं। हालांकि दोनों की विधानसभा सीटें कैराना लोकसभा क्षेत्र में पड़ती हैं। जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष चौधरी राजपाल सिंह गुर्जर कहते हैं कि उनकी बिरादरी का बड़ा समर्थन भाजपा के साथ है। जिले में राजपूतों की नाराजगी धीरे-धीरे कम हो रही है। राजपूत बिरादरी के दो पूर्व विधायकों वीरेंद्र ठाकुर और शशिबाला पुंडीर कहते हैं कि राजपूतों में दो-तीन कारणों से भाजपा को लेकर नाराजगी हैं। पहली यह कि अबकी राजपूतों को कम टिकट मिले हैं और जनरल वीके सिंह का टिकट भी काट दिया गया है। दूसरी यह कि राजपूतों को लगता है कि चुनावों के बाद भाजपा आलाकमान योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री के पद से हटा देगा। राजपूतों के इतने विरोध के बावजूद हाईकमान ने योगी आदित्यनाथ के पक्ष में कोई मजबूत बयान नहीं दिया हैं। यह अलग बात है कि पार्टी योगी आदित्यनाथ को बार-बार सहारनपुर भेज रही है। तीन बार वे पहले आ चुके हैं और 16 अप्रैल को योगी जी सहारनपुर नगर में  रोड़ शो में शामिल होंगे। इन हालात में सहारनपुर सीट पर उलझन की स्थिति बनी हुई है। देखने में मुकाबला त्रिकोणीय यानि भाजपा-कांग्रेस और बसपा में दिखता है। लेकिन अंत में भाजपा और कांग्रेस गठबंधन के बीच मतदाताओं का ध्रुर्वीकरण होने और सीधा मुकाबला होने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है।