सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
विवाहित बेटियां भी अनुकंपा नियुक्ति की हकदार
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी विवाहित बेटी को केवल शादीशुदा होने के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि पुत्र विवाह के बाद भी परिवार का सदस्य माना जाता है, तो केवल विवाह के कारण पुत्री को परिवार से अलग मानना संविधान के समानता के अधिकार के विपरीत है। यह फैसला 2 जून 2026 को सुनाया गया, जिसमें न्यायालय ने कहा कि सरकारी सेवा नियमों में विवाहित बेटियों को बाहर रखने वाले प्रावधान भेदभावपूर्ण और मनमाने माने जा सकते हैं। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि सामाजिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं और आज भी अनेक विवाहित बेटियां अपने माता-पिता पर आर्थिक रूप से निर्भर रहती हैं या उनके परिवार की जिम्मेदारी निभाती हैं। क्या अब हर विवाहित बेटी को नौकरी मिल जाएगी ? इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक विवाहित बेटी को स्वतः अनुकंपा नियुक्ति मिल जाएगी सुप्रीम कोर्ट ने केवल पात्रता का दायरा बढ़ाया है नियुक्ति के लिए अन्य सभी शर्तें पहले की तरह लागू रहेंगी संबंधित विभाग यह जांच कर सकता है कि आवेदक वास्तव में मृत कर्मचारी पर आश्रित थी या नहीं तथा परिवार आर्थिक संकट की स्थिति में है या नहीं चूँकि ऐसा फैसला अगया हैँ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद भी कई मामलों में विवाद की संभावना बनी रहेगी सबसे बड़ा प्रश्न आर्थिक निर्भरता का होगा यदि विवाहित बेटी अपने पति के साथ अलग रह रही है और आर्थिक रूप से सक्षम है तो विभाग उसके दावे की अलग से जांच कर सकता है इसके अलावा कई राज्यों और सरकारी विभागों के सेवा नियम अभी भी पुराने प्रावधानों पर आधारित रहेंगे ऐसे में राज्यों को अपने नियमों में संशोधन करना पड़ सकता है जब तक नियमों में बदलाव नहीं होता तब तक कई मामलों में अदालतों की शरण लेने की नौबत आ सकती है।
इस फैसले में "पैरेंट" या माता-पिता से आशय सामान्य रूप से उस कर्मचारी से है जिसकी सेवा के दौरान मृत्यु हुई हो अर्थात यदि मृत कर्मचारी पिता हैं तो बेटी उनके आधार पर दावा कर सकती है और यदि कर्मचारी मां थीं तो भी बेटी उनके आधार पर अनुकंपा नियुक्ति की पात्र हो सकती है यहां माता-पिता का अर्थ मुख्य रूप से जैविक या कानूनी रूप से मान्य माता-पिता से जिनकी नौकरी के दौरान मृत्यु हुई हो और जिनके आश्रित परिवार को राहत देने के उद्देश्य से यह व्यवस्था बनाई गई है।
अब क़ानून के जानकर यह भी प्रश्न उठा रहें हैँ क्या सास-ससुर के आधार पर भी मिल सकती है नौकरी?
यही वह प्रश्न है जिस पर आगे कानूनी बहस देखने को मिल सकती है। सामान्य परिस्थितियों में अनुकंपा नियुक्ति का लाभ मृत कर्मचारी के आश्रित परिवार को दिया जाता है। यदि सास या ससुर सरकारी कर्मचारी थे, तो उनके सेवा नियमों में जिन रिश्तेदारों को आश्रित माना गया है उन्हीं को लाभ मिलेगा अधिकांश मामलों में बहू को सीधे तौर पर पात्र आश्रित की श्रेणी में शामिल नहीं किया जाता हालांकि यदि किसी राज्य या विभाग के नियमों में बहू को आश्रित सदस्य के रूप में मान्यता दी गई हो और वह वास्तव में मृत कर्मचारी पर निर्भर रही हो तो विशेष परिस्थितियों में उसका दावा विचारणीय हो सकता है लेकिन वर्तमान फैसले का सीधा संबंध मुख्य रूप से पुत्रियों और उनके माता-पिता से जुड़े मामलों से है न कि सास-ससुर से।
सामाजिक और कानूनी महत्व कों समझें तो विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला केवल रोजगार का मामला नहीं है बल्कि महिलाओं के समान अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है लंबे समय से कई राज्यों में विवाहित बेटियों को केवल विवाह के आधार पर परिवार का हिस्सा नहीं माना जाता था सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने उस सोच को चुनौती दी है और स्पष्ट संदेश दिया है कि विवाह किसी बेटी के अपने माता-पिता से संबंध समाप्त नहीं करता बल्कि कानूनी जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में यह फैसला अन्य सेवा नियमों पारिवारिक अधिकारों और आश्रितों से जुड़े मामलों में भी मिसाल के रूप में उद्धृत किया जा सकता है हालांकि प्रत्येक मामले का अंतिम निर्णय संबंधित नियमों पारिवारिक परिस्थितियों और आर्थिक निर्भरता के तथ्यों के आधार पर ही होगा। इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों और समान अवसर की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है जिसका प्रभाव देशभर की लाखों सरकारी कर्मचारी परिवारों पर पड़ सकता है।
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