धार के सुदूर ग्राम सड़क में मुरम की जगह मिटटी का हो रहा इस्तेमाल
बैस में डाल रहे मिटटी तो कैसे टिकेगी सड़क
धार, जिले में मनरेगा में गड़बड़ी की तमाम शिकायतें हुई है। धार से लेकर भोपाल और दिल्ली तक यह शिकायतें पहुंची है। लेकिन इसके बाद अधिकारियों में वरिष्ठ अफसरों न तो खौफ है और न ही नियमों के तहत काम करने की जिम्मेदारी है। यहीं कारण है कि आदिवासी बाहुल्य जिले में कोरोना महामारी के वक्त लॉकडाउन के दौरान वरदान साबित होने वाली महात्मा गांधी रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा योजना पर पलीता लगता जा रहा है। अब हालात यह है कि गांव-फलियों में लोग रोजगार के लिए पलायन करने को मजबूर है और इसका फायदा उठाकर अफसर मनमर्जी करने नजर आ रहे है।
मनरेगा योजना के तहत होने वाले कामों में मशीनों के उपयोग पर पाबंदी है। लेकिन जिले में मशीनों से ही काम लिया जा रहा है। जाबकार्डधारियों के मस्टर तो भरे जा रहे है लेकिन मशीनों से काम कर अधिकारी मजदूरों के हक पर जेसीबी चलाने में व्यस्त है। मजदूरों के नाम पर निर्माण वाले कार्यों पर एक भी मजदूर नजर नहीं आता है। वहीं मशीनों से काम करने के बाद भी निर्माण के मापदंडों की अनदेखी देखने को मिल रही है। ऐसे में ग्रामीणों की सुविधा के लिए होने वाले कामों में सिर्फ और सिर्फ अधिकारियों का ही शुभ-लाभ होता नजर आ रहा है।
यह है मामला: दरअसल जिले के सरदारपुर विकासखंड के ग्राम खाकेड़ी से सगवाल तक सुदूर सड़क का निर्माण आवागमन बेहतर बनाने के लिए किया जा रहा है। इस पर 45 लाख रुपए खर्च किए जाना है। ग्रामीण यांत्रिकी सेवा विभाग सरदारपुर द्वारा इसका निर्माण करवाया जा रहा है। सबसे खास बात यह है कि इसमें ग्रामीणों से भी जनभागीदारी के रूप में सहायता राशि ली गई है। इसके बावजदू गुणवत्ता के नाम पर अधिकारी काम पर मिटटी फैरते नजर आ रहे है। एक्सपर्ट की माने तो सुदूर सड़क निर्माण के लिए सबसे जरूरी मुरम का इस्तेमाल होता है। मुरम का बैस तैयार करवाकर उस पर गिटटी बिछाई जाती है ताकि बारिश में सड़क बैठे ना। लेकिन यहां पर इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना देखने को मिला है। यहां पर जेसीबी मशीनों का इस्तेमाल कर काली मिटटी से बैस तैयार किया जा रहा है। काली मिटटी पानी लगने के बाद फूलती है और धूप लगने से फिर वह सिकड़ने लगती है। ऐसे में सड़क पर दोबारा गडढे होने की स्थिति बननेे की संभावना रहेगी। बावजूद इसके मुरम के बजाय डंपरों से काली मिटटी डाल दी गई है। वहीं मजदूरों की बजाय जेसीबी मशीनों से काम लिया जा रहा है। ऐसे में लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी ग्रामीणों को अच्छी सड़क नहीं मिल पाएगी।
लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी लीपापोती : खाकेड़ी से सगवाल के बीच बन रही इस सड़क की तस्वीरे सामने आने के बाद यह तय है कि लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी अधिकारियों की मैदानी स्तर पर लीपापोती जारी है। इस मामले में विभाग के संबंधित इंजीनियर एस कनेश से जब इस मामले में सवाल किए गए तो उन्होंने बीमारी का बहाना बनाकर बात करने से इंकार कर दिया। अब सवाल जिले के वरिष्ठ और जिम्मेदार अधिकारियों से है, जिन पर ग्रामीण अंचल में शासन की योजनाओं काेे अमलीजामा पहनाकर ग्रामीणों को लाभ दिलवाना है।
इनका कहना: ग्राम सुदूर सड़क निर्माण में मशीनों के इस्तेमाल की जानकारी मेरे संज्ञान में लाई गई है। इसे दिखवाया जाएगा। जहां तक मिटटी की बात है तो उसकी भी जांच होगी।