अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम विदाई पर उमड़ा जनसैलाब
सुरक्षा के बीच दुनिया की टिकीं ईरान पर निगाहें
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम विदाई को लेकर पूरे देश में अभूतपूर्व धार्मिक, राजनीतिक और भावनात्मक माहौल देखने को मिल रहा है राजधानी तेहरान से शुरू हुआ यह शोक कार्यक्रम अब कई प्रमुख शहरों तक फैल चुका है और ईरानी सरकार इसे राष्ट्रीय एकता तथा प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर रही है अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला परिसर में हजारों लोगों की भीड़ उमड़ी जबकि पूरे सप्ताह चलने वाले कार्यक्रमों में करोड़ों लोगों के शामिल होने का दावा किया जा रहा है कुछ सरकारी अनुमानों में लगभग 1.5 करोड़ से लेकर 3 करोड़ लोगों के भाग लेने की संभावना जताई गई है हालांकि स्वतंत्र रूप से इन आंकड़ों की पुष्टि नहीं हो सकी है सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि खामेनेई के बेटे और वर्तमान सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई सार्वजनिक रूप से अंतिम संस्कार में शामिल क्यों नहीं हुए ईरानी अधिकारियों का कहना है कि हाल के महीनों में उन्हें लेकर सुरक्षा संबंधी गंभीर खतरे सामने आए हैं और इजरायल तथा अमेरिका समर्थित संभावित हमलों की आशंका को देखते हुए उनकी सार्वजनिक मौजूदगी को सीमित रखा गया है इसी कारण मोजतबा खामेनेई को अंतिम संस्कार की मुख्य सार्वजनिक गतिविधियों से दूर रखा गया जबकि उनके प्रतिनिधियों और परिवार के अन्य सदस्यों ने औपचारिक रूप से कार्यक्रमों में भाग लिया अंतिम विदाई कार्यक्रम केवल तेहरान तक सीमित नहीं है शिया परंपरा के अनुरूप जुलूस और श्रद्धांजलि सभाओं का आयोजन तेहरान कुम, मशहद, इराक के नजफ और कर्बला जैसे पवित्र नगरों में भी प्रस्तावित किया गया है अंतिम दफन की प्रक्रिया मशहद में इमाम रज़ा दरगाह के निकट संपन्न होने की योजना बनाई गई है जिससे यह कार्यक्रम धार्मिक दृष्टि से और अधिक महत्वपूर्ण बन गया है ईरान ने इस अवसर पर कई मित्र देशों और सहयोगी संगठनों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया था रिपोर्टों के अनुसार रूस, पाकिस्तान, इराक, सीरिया, लेबनान, यमन और मध्य एशिया के कई देशों के प्रतिनिधिमंडल तेहरान पहुंचे हैं रूस की ओर से उच्चस्तरीय प्रतिनिधित्व पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व इराकी शिया नेताओं तथा लेबनान के हिजबुल्लाह से जुड़े प्रतिनिधियों की मौजूदगी विशेष रूप से चर्चा में रही दूसरी ओर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और अधिकांश पश्चिमी देशों ने इसमें भाग नहीं लिया और केवल औपचारिक संवेदनाएं व्यक्त कीं ईरान की जनता के बीच इस पूरे घटनाक्रम को लेकर मिश्रित भावनाएं दिखाई दे रही हैं सरकारी समर्थक वर्ग इसे राष्ट्रीय शहादत और प्रतिरोध की भावना से जोड़ रहा है बड़ी संख्या में लोग अमेरिकी और इजरायली नीतियों के खिलाफ नारे लगाते हुए बदले की मांग कर रहे हैं वहीं कुछ विश्लेषकों का मानना है कि आर्थिक कठिनाइयों और पिछले वर्षों के विरोध प्रदर्शनों के कारण समाज का एक हिस्सा सरकार से दूरी भी बनाए हुए है इसलिए पूरे देश की भावना को केवल इन विशाल जनसभाओं के आधार पर नहीं आंका जा सकता सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से यह संभवतः ईरान के इतिहास के सबसे बड़े अभियानों में से एक माना जा रहा है इस दौरान इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) नियमित सेना, पुलिस और खुफिया एजेंसियों को संयुक्त रूप से तैनात किया गया है प्रमुख धार्मिक स्थलों, हवाई अड्डों, राजनयिक परिसरों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा घेरा बनाया गया है ड्रोन रोधी प्रणालियां सक्रिय की गई हैं और कई संवेदनशील क्षेत्रों में हवाई निगरानी बढ़ाई गई है ताकि किसी भी संभावित हमले या आतंकी गतिविधि को रोका जा सके अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है उन्होंने हाल के अपने बयानों में कहा कि ईरान के वर्तमान नेतृत्व को अमेरिकी शक्ति का अंदाजा होना चाहिए और यह भी संकेत दिया कि अमेरिका के पास ईरानी नेतृत्व के खिलाफ कार्रवाई करने की क्षमता है हालांकि उन्होंने तत्काल किसी सैन्य कदम से इनकार किया और बातचीत की संभावना को पूरी तरह समाप्त नहीं बताया ट्रम्प के इन बयानों ने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस पूरे कार्यक्रम को अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है रूस, पाकिस्तान और कई शिया बहुल क्षेत्रों में इसे एक ऐतिहासिक शोक समारोह और क्षेत्रीय प्रतिरोध की अभिव्यक्ति माना जा रहा है जबकि पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों का ध्यान ईरान के अंदर राजनीतिक संक्रमण, क्षेत्रीय स्थिरता और भविष्य की सत्ता संरचना पर केंद्रित है जब कि कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक अंतिम संस्कार नहीं बल्कि नए ईरानी नेतृत्व की वैधता और जनसमर्थन को प्रदर्शित करने का भी अवसर बन गया है कुल मिलाकर अली खामेनेई की विदाई ईरान के लिए केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि राष्ट्रीय पहचान राजनीतिक उत्तराधिकार क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से जुड़ा एक ऐतिहासिक क्षण बन गई है जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।
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