जाने भारत में कहां हैं होयसला मंदिरों, क्या है इनकी विशेषता?
UNESCO की विश्व धरोहर सूची में मिली जगह
नई दिल्ली, कर्नाटक के होयसला मंदिरों को यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरिटेज साइट (विश्व धरोहर) की सूची में जगह दी है. सोमवार को यूनेस्को के आधिकारिक एक्स हैंडल (पहले ट्विटर) के माध्यम से बताया गया कि बेलूर, हलेबिदु और सोमनाथपुरा क्षेत्रों में स्थित होयसला मंदिरों को हेरिटेज साइट की सूची में स्थान दिया जा रहा है
यूनेस्को ने अप्रैल 2014 में इस प्राचीन मंदिर को अपनी अस्थायी सूची में जगह दी थी. होयसला मंदिर को 'होयसला का पवित्र समूह' भी कहा जाता है. होयसला मंदिरों को 2022 में 2022-23 के लिए भारत की तरफ से विश्व धरोहरों की सूची में स्थान दिलाने के लिए नामांकित भी किया गया था.
यह मंदिर 12वीं से 13वीं शताब्दी में बनाए गए थे. होयसल युग के कलाकारों और वास्तुकारों की रचनात्मकता और कौशल के प्रतीक के रूप में ये अब भी खड़े हैं. होयसल साम्राज्य ने 10वीं और 14वीं शताब्दी के बीच आधुनिक कर्नाटक राज्य के एक बड़े हिस्से पर शासन किया था. साम्राज्य की राजधानी शुरू में बेलूर में स्थित थी और बाद में हलेबिदु में स्थानांतरित हो गई थी.
होयसला मंदिरों में एक बुनियादी पारंपरिक दार्विडियन आकृति विज्ञान है, लेकिन मध्य भारत में व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली भूमिजा विधा, उत्तरी और पश्चिमी भारत की नागर परंपराओं और कल्याणी चालुक्यों द्वारा समर्थित कर्नाट द्रविड़ विधा का मजबूत प्रभाव दिखता है. वास्तुकारों ने विभिन्न प्रकार की मंदिर वास्तुकला से प्रेरणा ली और परिणामस्वरुप एक बिल्कुल नए 'होयसला मंदिर' स्वरूप का जन्म हुआ.
पीएम नरेंद्र मोदी की तरफ से भी होयसला मंदिरों को विश्व धरोहर के रूप में मान्यता मिलने पर अपनी प्रतिक्रिया दी. पीएम ने कहा, "होयसल मंदिरों की सुंदरता और जटिल विवरण, भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और हमारे पूर्वजों की असाधारण शिल्प कौशल का प्रमाण हैं."
यूनेस्को की आधिकारिक वेबसाइट पर बताया गया कि इन मंदिरों की विशेषता इनकी अति-वास्तविक मूर्तियां और पत्थर की नक्काशी है. यहां संपूर्ण वास्तुशिल्प सतह, एक परिक्रमा मंच, एक बड़े पैमाने की मूर्तिकला गैलरी और साला की मूर्तियां हैं.