भोजशाला विवाद पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
70 साल पुराने धार्मिक संघर्ष में नया मोड़
धार, मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला भारत के सबसे लंबे और संवेदनशील धार्मिक-ऐतिहासिक विवादों में से एक रहा है। हिंदू पक्ष इसे मां वाग्देवी (सरस्वती) का प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा यह विवाद लगभग 70 से अधिक वर्षों से कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर चलता रहा जबकि इसका ऐतिहासिक संदर्भ 11वीं शताब्दी तक जाता है। विवाद की शुरुआत कैसे हुई इतिहासकारों के अनुसार भोजशाला का निर्माण राजा भोज के समय 11वीं शताब्दी में हुआ था। इसे संस्कृत अध्ययन और देवी सरस्वती की उपासना का प्रमुख केंद्र माना जाता था बाद में मध्यकाल में यहां कमाल मौला नामक सूफी संत से जुड़ी मस्जिद संरचना विकसित हुई इसी कारण दोनों समुदाय इस स्थल पर अपना धार्मिक अधिकार जताने लगे ब्रिटिश काल और स्वतंत्रता के बाद यह विवाद और गहराया प्रशासन ने दोनों पक्षों के बीच व्यवस्था बनाने के लिए अलग-अलग समय तय किए हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई लेकिन बसंत पंचमी जैसे अवसरों पर विवाद बार-बार बढ़ता रहा क्योंकि हिंदू पक्ष उस दिन विशेष पूजा की मांग करता था जब इन वर्षों में विवाद ज्यादा गहराया 1930 से 1940 के दशक धार्मिक अधिकारों को लेकर शुरुआती तनाव 1950 से 1960 स्वतंत्र भारत में प्रशासनिक नियंत्रण और पूजा-नमाज के समय तय हुए औऱ 1990 के दशक बाबरी मस्जिद विवाद के बाद भोजशाला का मुद्दा भी राष्ट्रीय चर्चा में आया 2003 एएसआई ने परिसर को संरक्षित स्मारक माना और सुरक्षा बढ़ाई गई 2013 से 2024 तक बसंत पंचमी और शुक्रवार एक साथ पड़ने पर कई बार तनावपूर्ण स्थिति बनी 2024 मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एएसआई सर्वे का आदेश दिया, जिससे विवाद निर्णायक चरण में पहुंचा इसके बाद प्रशासन को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा भोजशाला विवाद प्रशासन के लिए कानून-व्यवस्था की बड़ी चुनौती बना रहा हर शुक्रवार और बसंत पंचमी पर भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ता था इंटरनेट और सोशल मीडिया मॉनिटरिंग करनी पड़ती थी धारा 144 लागू करनी पड़ती थी दोनों समुदायों के नेताओं से लगातार बातचीत करनी पड़ती थी कई बार बाहर से आने वाले संगठनों के कारण तनाव बढ़ा प्रशासन ने कई वर्षों तक “समय आधारित व्यवस्था” अपना कर स्थिति संभाली लेकिन इससे स्थायी समाधान नहीं निकल पाया जब मामला कोर्ट मे ले कर गये हिंदू संगठनों द्वारा “हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस” जैसे पक्षकारों ने अदालत में याचिकाएं दायर की उन्होंने मांग की कि परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मूल संरचना मंदिर थी या मस्जिद इसके बाद मामला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की जांच तक पहुंचा ASI सर्वे में क्या मिला 2024 में लगभग 98 दिनों तक चले सर्वे में एएसआई को 90 से अधिक हिंदू प्रतिमाओं के अवशेष,संस्कृत शिलालेख,मंदिर शैली के स्तंभ,देवी-देवताओं से जुड़े चिह्न मिले ASI ने करीब 2000 पन्नों की रिपोर्ट हाईकोर्ट में जमा की हिंदू पक्ष ने इसे मंदिर होने का प्रमुख प्रमाण बताया लगभग 70 साल से अधिक समय तक चले आधुनिक कानूनी विवाद और सदियों पुराने ऐतिहासिक दावों के बाद 2026 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने बड़ा फैसला सुनाया मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने फैसले में रिपोर्टों के अनुसार हाईकोर्ट ने भोजशाला को ऐतिहासिक रूप से मंदिर-संरचना माना,एएसआई रिपोर्ट को महत्वपूर्ण आधार माना परिसर में धार्मिक गतिविधियों को लेकर दिशा-निर्देश दिए सुरक्षा और शांति बनाए रखने पर जोर दिया औऱ फैसले में क्या क्या पेचीदगियां थीं इसे समझते हुये मामले में अदालत को कई जटिल पहलुओं से गुजरना पड़ा इतिहास बनाम धार्मिक आस्था दोनों पक्षों के ऐतिहासिक दावे अलग थे पुरातात्विक साक्ष्य एएसआई रिपोर्ट की वैज्ञानिक व्याख्या चुनौतीपूर्ण रही कानून-व्यवस्था किसी भी निर्णय से सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका थी संवैधानिक संतुलन अदालत को दोनों समुदायों के अधिकारों और शांति व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना पड़ा राजनीतिक संवेदनशीलता यह मामला ज्ञानवापी और मथुरा विवादों से भी जोड़ा जाने लगा यह फैसला केवल एक धार्मिक स्थल का निर्णय नहीं माना जा रहा हैँ बल्कि भारत में ऐतिहासिक धार्मिक विवादों की न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण उदाहरण भी माना जा रहा है।
देश
दुनिया
मनोरंजन
खेल
छत्तीसगढ
हरियाणा
दिल्ली
धार्मिक
व्यापार
टेक & ऑटो
शिक्षा
स्वास्थ्य
आंध्र प्रदेश
तेलंगाना
सिक्किम
ओड़िशा
झारखंड
असम
नागालैण्ड