इस मुस्लिम देश में 17 भारतीयों को सुनाई गई थी मौत की सजा
भारत ने सभी को बचा लिया; जानिए कैसे?
यमन के एक नागरिक की हत्या के मामले में दोषी ठहराई गई भारतीय नर्स निमिषा प्रिया को 16 जुलाई को फांसी दी जाएगी। 37 वर्षीय निमिषा केरल के पलक्कड़ जिले की रहने वाली हैं और 2017 से यमन की राजधानी सना की जेल में बंद हैं। निमिषा प्रिया की फांसी को रोकने के लिए भारत पुरजोर प्रयास कर रहा है। कूटनीतिक स्तर पर भी प्रयास जारी हैं। हालांकि ये तो वक्त ही बताएगा कि क्या निमिषा मौत के चंगुल से छूट पाएंगी या नहीं लेकिन अतीत में ऐसे कई मामले सामने आएं हैं जब भारत सरकार ने अपने अथक प्रयासों से विदेशों में फंसे भारतीय नागरिकों को छुड़ाया है। इनमें एक मामला 2009 का है जब मुस्लिम देश संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में 17 भारतीय नागरिकों को मौत की सजा सुनाई गई थी। आइए पूरा मामला विस्तार से समझते हैं।
यूएई में 17 भारतीयों की मौत की सजा: एक कूटनीतिक जीत
2009 में संयुक्त अरब अमीरात की एक अदालत में 17 भारतीय नागरिकों को मौत की सजा सुनाई गई थी। इन पर एक पाकिस्तानी नागरिक की हत्या का आरोप था। यह खबर भारत में तहलका मचा गई थी, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में भारतीयों को एक साथ विदेशी धरती पर फांसी की सजा का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन भारत सरकार, भारतीय दूतावास, और सामुदायिक प्रयासों की बदौलत इन सभी की जान बचाने में सफलता मिली। इस मामले में लगभग 4 करोड़ रुपये की ‘ब्लड मनी’ (दियात) का भुगतान और कूटनीतिक प्रयासों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यमन के एक नागरिक की हत्या के मामले में दोषी ठहराई गई भारतीय नर्स निमिषा प्रिया को 16 जुलाई को फांसी दी जाएगी। 37 वर्षीय निमिषा केरल के पलक्कड़ जिले की रहने वाली हैं और 2017 से यमन की राजधानी सना की जेल में बंद हैं। निमिषा प्रिया की फांसी को रोकने के लिए भारत पुरजोर प्रयास कर रहा है। कूटनीतिक स्तर पर भी प्रयास जारी हैं। हालांकि ये तो वक्त ही बताएगा कि क्या निमिषा मौत के चंगुल से छूट पाएंगी या नहीं लेकिन अतीत में ऐसे कई मामले सामने आएं हैं जब भारत सरकार ने अपने अथक प्रयासों से विदेशों में फंसे भारतीय नागरिकों को छुड़ाया है। इनमें एक मामला 2009 का है जब मुस्लिम देश संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में 17 भारतीय नागरिकों को मौत की सजा सुनाई गई थी। आइए पूरा मामला विस्तार से समझते हैं।
यूएई में 17 भारतीयों की मौत की सजा: एक कूटनीतिक जीत
2009 में संयुक्त अरब अमीरात की एक अदालत में 17 भारतीय नागरिकों को मौत की सजा सुनाई गई थी। इन पर एक पाकिस्तानी नागरिक की हत्या का आरोप था। यह खबर भारत में तहलका मचा गई थी, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में भारतीयों को एक साथ विदेशी धरती पर फांसी की सजा का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन भारत सरकार, भारतीय दूतावास, और सामुदायिक प्रयासों की बदौलत इन सभी की जान बचाने में सफलता मिली। इस मामले में लगभग 4 करोड़ रुपये की ‘ब्लड मनी’ (दियात) का भुगतान और कूटनीतिक प्रयासों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
क्या था पूरा मामला?
जनवरी 2009 में यूएई के शारजाह में एक पाकिस्तानी नागरिक की हत्या का मामला सामने आया। इस हत्या के लिए 17 भारतीयों पर आरोप लगाया गया। इनमें 16 पंजाब और एक हरियाणा का प्रवासी मजदूर था। ये लोग यूएई में निर्माण और अन्य निम्न-आय वाले कामों के लिए गए थे। शुरुआती जांच और अदालती कार्यवाही के बाद, उन्हें शराब की तस्करी को लेकर हुए झगड़े में पाकिस्तान के मिसरी खान की हत्या का दोषी ठहराया गया था। इस झड़प में मुश्ताक अहमद और शहीद इकबाल नामक दो लोग घायल हो गए थे।
इस मामले की जटिलता यह थी कि यूएई में शरिया कानून लागू होता है, जिसमें हत्या जैसे गंभीर अपराधों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान है। हालांकि, शरिया कानून में ‘दियात’ यानी ‘ब्लड मनी’ का भी प्रावधान है, जिसके तहत पीड़ित के परिवार को मुआवजा देकर सजा को माफ किया जा सकता है। इसी प्रावधान ने इस केस में एक उम्मीद की किरण दिखाई।
कौन थे सभी 17 भारतीय?
16 पंजाबी मजदूरों में सुखजिंदर सिंह, सुखजोत सिंह, राम सिंह, अरविंदर सिंह, बलजीत सिंह, दलजीत सिंह, धर्मपाल सिंह, सतगुर सिंह, सतनाम सिंह, कश्मीर सिंह, सुबन सिंह, कुलविंदर सिंह, कुलदीप सिंह, सुखजिंदर सिंह, नामज्योत सिंह, अमरीक सिंह और हरजिंदर सिंह शामिल थे। वहीं तरनजीत सिंह हरियाणा के रहने वाले थे। ये सभी मजदूरी के लिए यूएई गए थे।