शाजापुर में 270 साल पुरानी परंपरा का होगा निर्वहन
दो सालां के बाद शहर में गूंजेंगे राक्षसों के अट्टाहस, चौराहे पर विराजित हुआ कंस का पुतला
Curated by - BAGHWAN DAS BERAGI | CITYCHIEFNEWS
शाजापुर, कोरोना का प्रतिबंध हटने के बाद एक बार फिर शहर में 270 वर्ष पुरानी परंपरा निभाई जाएगी और शहर की सड़कों पर एक बार फिर राक्षसी अट्टाहस गूंजेंगे। तो वाक्युद्ध भी होगा। शहर के इस ऐतिहासिक आयोजन के न सिर्फ शहरवासी बल्कि जिलेवासी भी साक्षी बनेंगे।
दरअसल दिवाली के बाद आने वाली कार्तिक मास की दशमी पर शाजापुर में 3 नवंबर को कंस वध की 270 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन किया जाएगा। इसके लिए सोमवारिया बाजार स्थित कंस चौराहा पर सिंहासन रूपी मंच पर कंस के पुतले को विराजित कर दिया गया है। कंस वधोत्सव समिति के संयोजक तुलसीराम भावसार ने बताया कि दो साल के कोरोना काल के बाद इस साल कंस वधोत्सव व्यापक रूप से मनाया जाएगा। 3 नवंबर को दशमी तिथि पर रात 8.30 बजे बालवीर हनुमान मंदिर से चल समारोह शुरू होगा। इसमें देवता और दानव का रूप धरे कलाकार रथ पर सवार होंगे। चल समारोह सोमवारिया, मगरिया, काछीवाड़ा, बस स्टैंड, नई सड़क होता हुआ रात 10 बजे आजाद चौक पहुंचेगा। यहां देवता और दानवों के बीच वाक युद्ध होगा। इस दौरान कलाकार समसामयिक घटनाओं के साथ ही अन्य मुद्दों को लेकर एक-दूसरे पर शब्दों के तीर चलाएंगे। यहां वाक युद्ध के बाद चल समारोह रात 11.30 बजे के करीब सोमवारिया स्थित कंस चौराहा पहुंचेगा। यहां एक बार फिर वाक युद्ध होगा। इसके बाद कृ़ष्ण का रूप धरे कलाकार द्वारा सिंहासन पर चढ़कर कंस का वध कर पुतले को नीचे गिराया जाएगा। इसके बाद गवली समाजजन पुतले को घसीटते हुए गवली मोहल्ला तक ले जाएंगे। संयोजक भावसार ने बताया कि कंस वध से पहले गवली समाज के वरिष्ठजन का सम्मान किया जाएगा।
मथुरा के बाद सिर्फ शाजापुर में होता है आयोजन
संयोजक श्री भावसार ने बताया कि कंस वध का यह अनूठा आयोजन श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा के बाद सिर्फ शाजापुर में ही होता है। हालांकि कुछ शहरों में इसकी शुरुआत की गई है, लेकिन वहां रावण दहन की तरह यह कार्यक्रम होता है। शाजापुर में इसकी शुरुआत 269 साल पहले की गई थी और उक्त आयोजन का यह 270 वां वर्ष है। श्री भावसार ने बताया कि गोवर्धननाथ मंदिर के मुखिया स्व. मोतीराम मेहता ने करीब 269 वर्ष पूर्व मथुरा में कंस वधोत्सव को देखा था। इसके बाद उन्होंने शाजापुर में भी इसकी शुरुआत कर दी। शुरुआत के 100 साल तक यह आयोजन मंदिर के अंदर ही होता रहा, लेकिन इसकी प्रसिद्धि के बाद यहां काफी संख्या में लोग आने लगे। ऐसे में कंस वध का अनूठा आयोजन मंदिर के बाहर सोमवारिया बाजार में चौराहे पर होने लगा। कंस वध होने के कारण इस जगह का नाम कंस चौराहा पड़ गया।
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